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Sunday, 19 October 2014

लोकल गवर्मेंटों की राजनीतिक कमियां हो पूरी ..........!

स्थानीय जन प्रतिनिधि राजनीतिक शपथ और विनियमन के हकदार .......... !


1.  स्थानीय जन प्रतिनिधित्यों को मिलेगा या लेंगे सम्मान ……. ?
2.  महिला स्थानीय जन प्रतिनिधियों के पतियों का दखल हो प्रतिबंधित  
3.  नगर निगम और नगर पालिकाएं अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की बनें गंभीर और समन्वित प्रशिक्षण स्थल
4.  किसी भी व्यक्ति को दोबारा ना मिले चुनाव में टिकट
5.  स्थानीय चुनाव बनें राजनीतिक दलों की प्रयोगशाला

दिसम्बर 2014 में प्रदेश के नगरीय निकायों और जनवरी 2015 में ग्राम पंचायतों के चुनाव होने जा रहे हैं। ये लोकल गवर्मेंट हमारे प्रजातंत्र की प्राथमिक पाठशाला और प्रयोगशाला हैं। जहां हमारे लोकतंत्र को मजबूत आधार और विस्तार मिलता है। यहीं भावी राजनीतिक सदस्य तैयार होते हैं। भले ही शुरूआत में इस क्षेत्र में कुछ गल्तियां होती हों। भारत के पहले प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा था – प्रारंभ के समय में हमारे जन प्रतिनिधि भले ही कितनी गल्तियां करें। उन्हें करने देना चाहिए। और स्थानीय लोगों को हमें बार-बार अधिकार देना चाहिए। यहीं वो लोग है जो आगे चलकर परिपक्व होकर व्यवस्था को आधार और दिशा देंगे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने तो स्थानीय शासन के जरिए ही देश में राम राज लाने का सपना देखा था।
हमारे पूर्वजों और लाभ की भावना को देखकर सबसे पहले स्थानीय जन प्रतिनिधियों को जीतने के बाद राजनीतिक शपथ दिलवाना चाहिए। उनके कार्यकाल का विनियमन भी किसी राजनीतिक व्यक्ति ने करना चाहिए। प्रशासनिक व्यक्ति ने नहीं। इससे जमीनी स्तर पर सरकार की अगुवाई करने वाले लोगों की गरिमा और उत्साह में बढ़ोत्तरी होगी। उमंग से भरकर वे निष्ठा और ईमानदारी से विकास कार्य करेंगे। अपनी शिकायत को अपने राजनीतिक वरिष्ठ के पास खुलकर निडरता से बोल सकेंगे। प्रशासन की प्रक्रिया के लंबे, नीरस, और उलझनों में उलझी दुरूह निर्णय प्रक्रिया के दूर हो जाने पर स्थानीय जन प्रतिनिधी विमुख नहीं हो पायेंगे। स्थानीय स्तर पर चुने हुए नेताओं को शपथ दिलाने और उन्हें विनियमन के ये दोनों काम अभी प्रत्येक जिले के कलेक्टर करते हैं।
बोला जाता है। स्थानीय प्रतिनिधियों के बड़े विस्तार और संख्या अधिक होने के नाते उन्हें किसी राजनीतिक व्यक्ति के द्वारा शपथ दिलाना या सीधे नियंत्रण में लेना व्यावहारिक नहीं है। इससे संबंधित व्यक्ति के पास काम इतना अधिक बढ़ जायेंगा कि जिसे व्यावहारिक तौर क्रियान्वित कर पाना कठिन और खर्चीला होगा। सबसे बढ़कर इस काम से नीचलें स्तर पर राजनीति प्रवेश कर जायेंगे। जो राजनीतिक रूप से कम अनुभवी इन लोगों और समाज के लिए ठीक नहीं है। कारण अनेक है, लेकिन हमें कदम बढ़ाना तो होगा।
माना !  राज्यपाल एक संवैधानिक पद है। महामहिम को ये अधिकार देना व्यावहारिक नहीं है। रही बात मुख्यमंत्री की तो इससे उनके काम में भारी विस्तार हो जायेंगा। इसका प्रभाव प्रदेश के शासन कार्यों पर पड़ेगा। इन सभी बाधाओं के बावजूद हम इतना तो कर ही सकते है। नगरीय निकायों के चुने हुए जन प्रतिनिधियों को प्रदेश के नगरीय निकाय और स्थानीय शासन मंत्री से शपथ दिलाकर। सीधे उन्हें इनके नियंत्रण में दिया जा सकता है। इसी भांति ग्राम पंचायतों के चुने हुए लोगों को प्रदेश के पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री से शपथ दिलवाकर। इन्हें भी इस मंत्री के अधीन विनियमन के दायरे में लाकर निजात दिलाई जा सकती है। इससे हमारा राजनीतिक लक्ष्य भी पूरा होगा, और ज्यादा कोई व्यावहारिक कठिनाई भी नहीं आयेंगी। प्रजातंत्र के इस पवित्र काम को प्रदेश की राजनीति स्वयं आगे बढ़कर पूरा करेंगी या नहीं। या फिर इस काम को पूरा करने के लिए जन प्रतिनिधी स्वयं आगे बढ़कर शासन से मांग करेंगे। ये समय बतायेंगा।
स्थानीय स्तर पर मध्यप्रदेश ने महिलाओं के लिए लोकल चुनावों में 50 स्थान आरक्षित किए हैं। इस कदम से महिलाओं को स्थानीय शासन में प्रशंसनीय प्रतिनिधित्व मिल रहा हैं। स्थानीय शासन में आये क्रांतिकारी बदलाव के इस शुरूआती दौर में पुरूषों ने अपनी पुरातन मानसिकता के चलते कहों या मजबूरियों के। एक नई अवधारणा पतिवाद चला रखी है। महिलाएं इस क्षेत्र में बड़े तौर पर अपने राजनीतिक हक के प्रयोग के मामलें में आज भी पृष्ठ भूमि में दबी हुई हैं। कहीं शिक्षा के बहाने कहो या उम्मीदवार नहीं मिलने के बहाने। या फिर आर्थिक कमजोरी के। या दबंगाई के डर से। बात एक है। सुधार होना जरूरी है। तभी हम बिना लिंग भेदभाव के वास्तविक स्थानीय प्रजातंत्र बना पायेंगे। बड़े आकार ले चुके इस पतिवाद को शासन ने आगे बढ़कर अवश्य रोकना चाहिए। कोई कानून बनाकर कठोरता से क्रियान्वित होना श्रेष्यकर होगा।
हमारी संसदीय शासन प्रणाली की कमियों को दूर करने विकल्प के तौर पर हमने नये नगर

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पालिका और नगर निगम अधिनियम में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपनाया है। इन दोनों शहरी संस्थाओं को स्थानीय सरकार के साथ मिलकर राज्य सरकार को गंभीर और समन्वित राजनीतिक प्रयास करना चाहिए। समय-समय पर रिफ्रेशर ट्रेनिंग देना होगी। अध्यक्षात्मक शासन की अवधारणा और महत्व समझाना होगा। इस पावन काम को स्थानीय प्रतिनिधित्व करने वाले लोग भी गंभीरता से लें। तभी हम प्रजातंत्र की अगुवाई करने वाली इस अवधारणा में से अच्छी बातें ले सकेंगे। हमारे लोकतंत्र को स्थीर मजबूती दे सकेंगे।
जनता के तंत्र की विशेषता है। यह किसी व्यक्ति विशेष, परिवार, समूह या संगठन का नहीं हैँ। यह सब लोगों का हैं। इस पर सबका नैसर्गिक हक है। बारी-बारी से व्यवस्था को चलाने का अधिकार देश के हर नागरिक को मिलना चाहिए। ऐसा व्यवहार में तभी संभव है जब राजनीतिक दल अपने यहां उम्मीदवार बनाते समय पुनर्नियुक्ति के भेदाव के अपने यहां से हटा दें। दोबारा स्थानीय स्तर पर किसी व्यक्ति को टिकट नहीं दें। चाहे वो फिर राजनीतिक पुरस्कार के नाते हो, या व्यक्तिगत राजनीतिक संबंधों के नाते। राजनीतिक धरोहर का स्वामी होने के नाते रिस्तेदारों को बार-बार टिकट देना भी गलत है। इसी तरह अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के नाते ही क्यों न दोबारा टिकट दिया जाय। अपनाए गये सभी तरीके प्रजातंत्र के मूल सिद्धांत शासन में भागीदारी सभी का हक, के विपरित है।
सभी विशेषकर राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से विनम्र अपील हैं। वे आगामी स्थानीय चुनावों में प्रयोग के तौर पर ही सही किसी भी व्यक्ति को दोबारा टिकट नहीं दें। इससे दल विशेष ही वास्तविक तौर पर प्रजातांत्रिक आकार लेगा। लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के अनुसार शासन में अधिकतम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित होगी। अवसर बढ़ने से राजनीति के प्रति लोग अधिक आक्रष्ट होंगे। इन प्रयोगशालाओं से सार्वजनिक जीवन में अधिक अच्छे लोग आयेंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे सार्वजनिक जीवन में सुचिता आयेंगी। निष्ठा का समावेश होगा। राजनीति चलित हो जाने के कारण व्यावसाय के तौर पर अपनाने वालों के लिए राजनीति धरोहर नहीं रह जायेंगी। राजनीति में चल रहे दोष काफी हद तक स्वमेव कम हो जायेंगे। एक विकसित और स्थिर राजनीतिक ढांचे के सहारे, हम भविष्य में विकसित देशों से प्रतिस्पर्धा कर पायेंगे।
(इदम् राष्ट्राय स्वा:, इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम्)

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