भारत की संस्कृति विशेष है। जो हमारे पास है। वह दूसरों के पास नहीं। हम जीवन को सनातन निरंतरता से जोड़ते हैं। व्यक्ति के अच्छे कामों के प्रति गौरव अभिव्यक्ति करते हैं। वंदन करते हैं। व्यक्ति में आत्म गर्व का संचार करते है। हमारी आगामी पीढ़ी उनसे सीख लेती है। भविष्य का आधार बनता है। आज रघुनंदन जी ने अपनी उम्र के 75 वर्ष पूरे कर लिए। आज हम उनके जन्म की हीरक जयंती मना रहे है उनके कार्यों, समर्पण और निष्ठा का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। उनका वंदन कर रहे हैं। अभिनंदन कर रहे हैं।
चरैवेति -चरैवेति के साथ एक मौन तपस्वी की तरह चलते रहे रघुनंदन। बिल्कुल हनुमान बनकर। एक दशक से अधिक लंबे समय तक भाजपा प्रदेश कार्यालय मंत्री बनकर पार्टी की एक निष्ठ सेवा की। पूरे प्रदेश के कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करते रहे उनका सहयोग करते रहे। प्रदेश की राजनीति में भाजपा के लिए सूझ से बाहर का समय। वैसा ही जैसे राम के सामने 100 योजन का समुद्र पार कर अनाचार - अनति को खत्म कर मानव कल्याण का रास्ता बनाना। राजनीति के विपरीत समय में बिना विचलित हुए पार्टी मुख्यालय संभालते रहे।
सिद्धांतों के पक्के। रघुजी का पूरा जीवन निष्कलंक। उन्होंने संस्कार संघ से लेकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल- आडवाणी और कुशाभाऊ ठाकरे के सानिध्य से पाए। इस कट्टर राष्ट्रवादी नेता में हिंदुत्व कूट-कूट कर भरा हुआ है जो उन्हें कभी कभी सच बोलने से नहीं रोक पाता है। राष्ट्रवादी ललक के कारण रघुनंदन ने सरकारी शिक्षक से इस्तीफा दे दिया। 1970 के दशक में भारतीय जनसंघ से विधायक चुने गए। और फिर लगन समर्पण को देख उन्हें मुख्यालय संभालने का काम दिया। इसके बाद पार्टी ने रघुनंदन को राज्यसभा में सांसद बनाकर दिल्ली भेजा।
अपने काम के साथ-साथ अध्ययन और लेखन का अतिरिक्त गुण रघुजी के भीतर लगातार विकसित होता रहा बड़ा आकार लेता रहा। आज रघुनंदन जी ने राजनीति और आध्यात्मा पर अनेक पुस्तकें की लिखी हैं। उनकी इसी मनीषी अध्यात्म विद्वता को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें "राम - पथ" गमन को खोजते हुए उसके उद्धार का काम सौंपा। इस दिव्य काम को उनके मार्गदर्शन में आगे बढ़ाया।
आज रघुनंदन मध्यप्रदेश तुलसी प्रतिष्ठान के कार्यकारी अध्यक्ष बन कर काम कर रहे हैं। प्रतिष्ठान में दिख रहे व्यवस्थित स्वच्छ परिवर्तन मे उनके प्रभाव की झलक को देखा जा सकता है। अब रघुनंदन लेखन और अध्ययन के साथ तुलसीदास जी के संस्कारों उनके उद्देश्यों को पूरा करने में अपना समय दे रहे हैं। हम सबके प्यारे रघु जी हमेशा स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहें। दीर्घायु... शतायु 100 की उम्र को पार करें। हम सबकी मनोकामना है ईश्वर हमें रघु जी के जन्म की स्वर्ण जयंती मनाने का अवसर दें।
मैं उस समय से पांव-पांव वाले इस बड़े भैया को जानता हूं । जब से विदिशा लोकसभा के लगभग 1500 गांव कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदरलाल पटवा, लखीराम अग्रवाल और कैलाश नारायण सारंग के लोक व्यक्तित्व में पूरे किए। यदि शिवराज ने कुशाभाऊ ठाकरे से लोक सेवा का परम धर्म सीखा। सुंदरलाल पटवा से आक्रामक निडर सार्वजनिक जीवन शैली लेते हुए शिवराज जी ने अपने जन हितेषी व्यक्तित्व को निखारा। तो कैलाश नारायण सारंग ने उन्हें एक निष्ठा लगन दी। उस समय के वरिष्ठ नेता लखीराम अग्रवाल हो या अन्य कोई सभी की जन हितेषी ललक ने शिवराज के जीवन पर एक अमिट छाप छोड़ी और शिवराज अपने जन व्यक्तित्व में एक विनम्र सिंह बनकर उभरे। शिवराज सिंह चौहान के गुरु ने गलती नहीं करने के लिए उन्हें मंत्र "मत चूको चौहान" दिया और सन 2005 से शुरू हुआ शिवराज।
शिव मतलब लोक कल्याणकारी एक भागीरथ प्रयास। कुछ ही वर्षों में लगने लगा अब मध्य प्रदेश में विकास की गंगा बहेगी प्रगति की गति तेज होगी नई आशा का प्रदेश में संचार हुआ। आज शिवराज जी के व्यक्तित्व ने उन्हें मध्य प्रदेश का लोकप्रिय जन हितेषी किसान का बेटा बेटियों का मामा मध्य प्रदेश का लोकप्रिय मुख्यमंत्री बना दिया।अपने अथक प्रयासों से आज मध्यप्रदेश में कृषि विकास दर, सिंचाई रकबा, ऊंचाइयों को छू रहे सामाजिक सुरक्षा के स्तर, प्रदेश में बेटियों के निश्चिंत जीवन सम्मान के साथ बेटियों के लिए इस मामा ने अवसरों को सुलभ कराया। हमारे गरीब कमजोर भाइयों के लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास का निर्माण कर उन्हें सम्मान गौरव का जीवन दे रहे हैं जो गरीब के लिए बड़े ही गर्व की सम्मान की बात बनी है। आधुनिक लोक राज्य की विशेषता राज्य का कोई व्यक्ति भूखा नहीं सो सकता को साकार करने के लिए कोरोना काल में ही नहीं हमेशा गरीबों के लिए शिवराज में निशुल्क राशन की व्यवस्था की जा रही है। आज शिवराज का जीवन व्यक्तित्व अंत्योदय को निरंतर साकार कर रहा है पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी और कुशाभाऊ ठाकरे के सपनों को पूरा कर रहा है और अपनी मातृभूमि की सेवा लगन भागीरथी प्रयासों के साथ कर रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय से पिछड़ा मध्य प्रदेश किसी भागीरथी मुखिया का इंतजार कर रहा था मध्यप्रदेश में इस खाली स्थान को शिवराज जी ने भरकर पूरा किया है और आज मध्य प्रदेश विकास के मामले में अग्रणी राज्यों के साथ कदमताल कर रहा है और गरीबी के दलदल से बाहर निकल गया है जो शिवराज जी के अथक प्रयासों से संभव हो पाया है।
नागरिकों के अपने विकास, व्यवसाय, वाणिज्य की निजी प्रगति के लिए मध्य प्रदेश वित्त लोन उपलब्ध कराने वाले अग्रणी राज्यों में से एक है। चाहे बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण, अवसर, लोन और अपने स्टार्टअप शुरू करने हो। युवाओं को एक नए कॉन्फिडेंस आत्मविश्वास में लिया है और उनमें अपने रोजगार स्थापित करने के लिए
मध्यप्रदेश में एक नया आत्मविश्वास जगाया है। शिक्षक, पटवारी, पुलिस सचिवालय और प्रशासन के अनेक क्षेत्रों में सरकारी सेवाओं के अवसर युवाओं को पिछले 15 वर्षों में मध्य प्रदेश सरकार ने दिए हैं। शिवराज सरकार के किए गए काम तो अनेक है लेकिन मध्य प्रदेश की लोकप्रिय शिवराज सरकार के सभी काम का उल्लेख करना यहां संभव नहीं है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मुख्यमंत्री का यह लंबा कार्यकाल बिल्कुल उनके नाम को "सत्यम-शिवम- सुंदरम" के समान साकार करता हुआ आगे बढ़ रहा है। जो सच्चे अर्थ में शिवराज सिंह चौहान के जीवन, व्यक्तित्व और उनकी शैली को आसान तरीके से समझा देता है। समझने में सहायक है। शिवराज सिंह चौहान का लोक जीवन एक विचार की तरह आकार लेता हुआ आगे बढ़ रहा है। हमारे लिए एक अनुकरण का रूप लेता जा रहा है। राजनीति के सार्वजनिक जीवन में एक अनुसंधान का विषय बनता जा रहा है जो शोध योग्य है। कहे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
मैंने भी अपने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संवेदनशील, उदार, संयम, गंभीर, धैर्य, सहनशील सेवा भाव से प्रेरणा सीख लेते हुए साल 2018 में मुलताई विधानसभा के लगभग 200 से ऊपर गांव का प्रवास "पांव-पांव वाले छोटे भैया" बनकर किया जो आज भी लगातार जारी है। यह उनके जन्मदिन पर शिवराज सिंह चौहान जी को मेरी ओर से एक लोक उपहार है। जियो हजारों साल... शिवराज जी की हमेशा जय हो...विजय हो....!
राष्ट्र प्रेरणा के अमर स्त्रोत नेताजी
सुभाष चन्द्र बोस
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जीवन आत्म-उत्सर्ग
की एक कहानी है। जो निर्जीव और हतोत्साहित व्यक्तियों में स्फूर्ती और आशा का
संचार कर सकती है। नेता जी ने देश के स्वाधीनता संग्राम में अपने जीवन को समग्र
न्यौछावर कर दिया। सुभाष बाबू ने आई.सी.एस. परीक्षा में चौथे नम्बर पर आकर सभी को
अचंभित कर दिया। लेकिन देश की राजनीतिक उथल-पुथल। और देश भक्ति की आंधी से प्रेरित
हो सुभाष ने आई.सी.एस. की नौकरी छोड़ दी। प्रिंस आफ वेल्स के स्वागत के बहिष्कार
के सम्बंध में सुभाष चन्द्र बोस को पहली बार गिरफ्तार करके 6 माह की सजा दी गई। सुभाष
दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष का पद सबसे
बड़ा सम्मान था। जो भारतीय जनता अपने सर्व प्रिय नेता को दे सकती थीं। नामजद सदस्य
पट्टाभि सितारमैया की पराजय पर स्वयं गांधी जी ने कहा था। वह उनकी हार है। गांधी
जी से नेताजी का मतभेद नीति और साधन दोनों आधारों पर रहा। सुभाष चन्द्र बोस
कांग्रेस की दक्षिण पंथी नीति से सदैव असंतुष्ट रहते थे। वह अपने संगठन को सदैव
वामपंथी रखना चाहते थे।
अंत में उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। और एक नवीन
राजनीतिक दल फारवर्ड-ब्लाक की स्थापना की। वह उत्तर-पश्चिम सीमा-प्रांत और
अफगानिस्तान के मार्ग से पहले रूस पहुंचे। उसके पश्चात जर्मनी। जहां हिटलर ने उनका
स्वागत किया। वह मुसोलिनी से भी मिले। सुभाष चन्द्र बोस ने बर्लिन से ब्रिटेन के
विरोध में प्रचार किया। जर्मनी द्वारा युद्ध में पकड़े गएं। भारतीय सैनिक बंदियों
की एक प्रथक सेना संगठित की। जब जापान ने सिंगापुर को जीत लिया। तब सुभाष चन्द्र
बोस ने दक्षिण-पूर्वी एशिया में भारतीयों की गतिविधियों के बारे में सुना। तभी वे
वहां पहुंचे।
भारत के महान् क्रांतीकारी रास बिहारी बोस ने
बैंकाक में भारत स्वतंत्रता लीग की स्थापना की। तिरंगे झण्डे को वहां लहराया। अपना
लक्ष्य भारत की तुरंत और पूर्ण स्वतंत्रता रखा। सिंगापुर के पतन के पश्चात।
अंग्रेजों ने 40 हजार भारतीय सैनिकों को जापान को सौंप दिया। जापान ने इन भारतीय
सौनिकों कैप्टन मोहन सिंह को सौंप दिया। मोहन सिंह ने अपने थोड़े सैनिकों के साथ
आजाद-हिन्द सेना का गठन किया। बाद में नागरिक भी इस सेना में सम्मिलित हुए। इस
सेना के अधिकारी केवल भारतीय ही थें। निश्चय किया गया। यह सेना केवल भारत की
स्वतंत्रता के लिए ही युद्ध करेंगी।
सुभाष चन्द्र बोस आजाद-हिन्द सेना के आमंत्रण पर
जापान पहुंचे। जापान के प्रधान मंत्री टोजो ने उनका स्वागत किया। उसने सुभाष
चन्द्र बोस को स्पष्ट किया। जापान भारत की स्वतंत्रता चाहता है। उसे अपने लिए कुछ
नहीं चाहिए। परंतु युद्ध के समय में भारत जापान की अधीनता में रहेगा। सुभाष चन्द्र
बोस ने उनकी इस बात को स्वीकार कर लिया। नेता जी ने अंग्रेजों के विरूद्ध। भारत की
स्वतंत्रता के लिए। संघर्ष करने। अपना पहला संदेश। भारतीयों को टोकियो रेडियों से
दिया। सुभाष चंद्र बोस के सिंगापुर पहुंचने पर। भारतीयों और भारत स्वतंत्रता लीग
ने भव्य स्वागत किया। पूर्वी एशिया के भारत स्वतंत्रता संग्राम की बागडोर रास
बिहारी बोस ने सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी।
सुभाष चन्द्र बोस को आजाद हिंद सेना
का सेनापति बना दिया गया। उसी समय सुभाष चन्द्र बोस नेता जी पुकारे गए। नेता जी
द्वारा आवाज लगाई गई। दिल्ली चलों। इस आवाज ने सिपाहियों पर जादू का असर किया। वह
दिन भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया। जब आजाद हिंद फौज की सेनाएं कोहिमा
और मणिपुर के युद्ध में जुट गई। दो महीने में ही उनका आक्रमण उग्र हो गया।
अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। सारे विश्व ने। सुभाष चन्द्रबोस की विलक्षण संगठन
शक्ति का अनुभव किया। सुभाष ब्रिगेड, गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और आजाद
ब्रिगेड में सेना का वितरण किया गया। कैप्टन लक्ष्मी सहगल की देखरेख में महिलाओं
की अलग झांसी रानी रेजीमेंट थी। बच्चों की अलग टुकड़ी थी। बच्चों का यह दल अत्यंत
उपयोगी सिद्ध हुआ।
कुछ माह पश्चात उन्होंने सिंगापुर में स्वतंत्र
भारत की एक अस्थाई सरकार की स्थापना की। इस सरकार ने मित्र राष्ट्रों से युद्ध की
घोषणा कर दी। कुछ ही दिनों में स्वतंत्र भारत की इस अस्थायी सरकार को। जापान,
जर्मनी, इटली, कोरिया, बर्मा, थाईलैंड, राष्ट्रीय चीन, फिलीपींस और मनचूरिया ने
मान्यता प्रदान कर दी। राष्ट्रीय अभिवादन- जय हिंद। राष्ट्रीय मुहर और राष्ट्रीय
चिन्ह- टीपू सुल्तान का शेर। राष्ट्रीय बैज, राष्ट्रीय गीत, शुभ, सुख चैन की बरसा।
और न जाने कितनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ती आजाद हिंद फौज में भारतीय रीति से
की गई। साम्प्रदायिक एकता का जो आदर्श आजाद हिंद फौज ने उपस्थित किया। वह हमेशा
स्मरणीय और अनुकरणीय है। जापान ने अंडमान-निकोबार द्बीप समूह को इस सरकार को सौंप
दिया। आजाद हिंद सेना ने जापानियों के साथ मिलकर साहस से युद्ध में भाग लिया। असम
में इम्फाल तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की। परंतु उसके पश्चात उसे पीछे हटने के
लिए बाध्य होना पड़ा। जापान को भी मित्र राष्ट्रों के सम्मुख आत्म समर्पण करना
पड़ा।
कहा जाता है। सुभाष चन्द्र बोस कुछ जापानी
अधिकारियों के साथ बैकांक से टोकियो जाने के लिए निकले। तभी उनके हवाई जहाज में आग
लग गई। और सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। दुनिया अवाक् रह गई। नेता जी युग-युग
के लिए अमर हो गए। भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गएं।
नेताजी के प्रयास विफल
हुएं। फिर भी उनके प्रयासों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक भूमिका
निभाई। आजाद हिंद फौज का नाम युगों तक अमर रहेंगा। पीठ पर सुरंगे बांधकर। जमीन पर
लेटकर। ब्रिटिश टैंकों को उड़ाने वाले बाल सैनिकों। भूखे पेट या पत्तें खाकर छापा
मारने वाले। गुलामी के घी से आजादी की घास को श्रेष्ठ समझने वाले सैनिकों।
सोलह-सोलह घंटे तक युद्ध करके ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ा देने वाली रानी झांसी
रेजीमेंट की महिला सैनिकों को युग-युग तक इतिहास में याद किया जायेगा।
सुभाष चन्द्र बोस अभी तक भारत के एक राष्ट्रीय
नेता स्वीकार किए जाते है। एक देश प्रेमी के रूप में भारतीय उन्हें हमेशा याद करते
रहेंगे। आजाद-हिन्द फौज और उनके अधिकारियों के दिल्ली के लाल किले में हुए
ऐतिहासिक मुकदमें ने सम्पूर्ण भारत में एक जन आन्दोलन को जन्म दिया। इस सेना के
निर्माण से अंग्रेजों का विश्वास भारतीय सेना से उठ गया। इन सभी घटनाओं ने
अंग्रेजों को भारत छोड़ देने के लिए प्रभावित किया।
“बहुजन हिताय बहुजन सुखाय” महापुरूष
जन्म लेते हैं। उनका आविर्भाव समाज के हित के लिए होता है। वे समाज की रूढ़िवादी
परंपरा का अनुसरण नहीं करते। अपितु वे समाज को बदल डालते हैं। विश्व वरेण्य वीर
सन्यासी स्वामी विवेकानन्द ऐतिहासिक पुरूष थे। जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव
डाली।
विवेकानन्द हिन्दू धर्म और उसकी आध्यात्मिक
भावना के प्रतीक थे। उनके उपदेश ने न केवल हिन्दू धर्म और समाज को शक्तिशाली
बनाया। साथ ही भारतीय राष्ट्रीयता को भी मजबूत बनाया। उन्होंने हिंदू आध्यात्मवाद
का पुनरूत्थान किया। ऐसा करते हुए इस्लाम और ईसाई धर्म पर हिंदू धर्म की श्रेष्ठता
स्थापित की। उन्होंने हिंदू धर्म और समाज की दुर्बलताओं को भी स्पष्ट किया। उन्होंने
हिंदूओं को बताया। यदि वे वेदांत के बताये मार्ग पर चले तो वे अपने धर्म की आत्मा
को समझ जाएंगें। और पुन: एक
गौरवपूर्ण राष्ट्र का निर्माण करने में सफल होंगे। विवेकानंद जी ने हिंदू
आध्यात्मवाद का उपदेश पश्चिमी जगत को भी दिया। इससे यूरोप में हिंदू धर्म की
श्रेष्ठता स्थापित हुई। इससे हिंदूओं में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति विश्वास
और आस्था जागृत हुई। इससे हिंदुत्व पुन: जागृत हो गया। इससे हिंदूत्व की उस दिशा में प्रगति संपन्न
हुई जिसे बहन निवेदिता ने उग्र हिंदूत्व बताया।
विवेकानन्द धर्म को देवत्व मानते है। जो स्वत: ही मनुष्य में है। उनका
उपदेश था। धर्म आत्म ज्ञान है। व्यक्ति को अपनी प्रकृति को अपने अधिकार में रखना
चाहिए। वही निर्माण का मार्ग है। एक राष्ट्र की प्रगति का मापदंड उसकी आध्यात्मिक
प्रगति भी है। इस कारण। उन्होंने प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक व्यक्ति समूह को
धर्म और आध्यात्म का पालन करने की सलाह दी। स्वामी विवेकानन्द व्यक्ति की भौतिक
उन्नति में भी विश्वास करते थे। इस आधार पर वे पूर्व और पश्चिम में विचारों के
आदान-प्रदान को आवश्यक मानते थे। उनका विश्वास था। भारत पश्चिमी संसार को आध्यात्मिक
ज्ञान प्रदान कर सकता है। भारत पश्चिम से भौतिक उन्नति के तरीके सींख सकता है।
स्वामी विवेकानन्द सभी धर्मों की समानता के
सिद्धांत को स्वीकार करते थे। इस कारण। सभी धर्मों के अनुयायियों को सहनशीलता,
समानता और सहयोग का उपदेश दिया। उन्होंने कहा। “ एक-दूसरे से लड़ों मत, बल्कि एक-दूसरे की सहायता करों।” आपस में सामंजस्य स्थापित
करों। विनाश नहीं। शांति रखों। उन्होंने कहा। विभिन्न धर्मों में अन्तर होना
स्वाभाविक है। और आवश्यक भी। तुम सभी को समान विचार स्वीकार करने के लिए बाध्य
नहीं कर सकते। यह सत्य है। मैं इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूं। विचारों का
अंतर और विचारों का संघर्ष ही नवीन विचारों को जन्म देता है।
उन्होंने धर्म का पालन करने के लिए। शिक्षा,
स्त्रियों का उद्धार और गरीबी को समाप्त करना अत्यंत आवश्यक बताया। विवेकानंद जी
ने मानव मात्र की सेवा करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य बताया।
ईश्वर विभिन्न रूपों में तुम्हारें सामने है। जो ईश्वर के बच्चों को प्यार करता
है। वह ईश्वर की सेवा करता है। ईश्वर की खोज में कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। सभी
निर्धन, अज्ञानी, अशिक्षित और असहाय व्यक्ति की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
शिक्षित भारतीयों को उपदेश दिया। जब तक करोड़ों व्यक्ति भूखें और अशिक्षित हैं। तब
तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को देश द्रोही मानता हूं। जो उसके ही धन से पढ़कर उनकी
ओर कोई ध्यान नहीं देता। मानव मात्र और समाज की सेवा करना स्वामी के उपदेशों का
पहला उद्देश्य था। उनका विश्वास था। आध्यात्मिक प्रगति से मनुष्य को आत्मज्ञान
होगा। और वह स्वत: ही समाज और राष्ट्रीय
उत्थान में सहयोग देगा। वह मनुष्य को वास्तविक मानव बनाने में विश्वास करते थे। मनुष्य
को सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र की उन्नति का आधार मानते थे।
स्वामी विवेकानंद ने भारत की राष्ट्रीय भावना के
निर्माण में भाग लिया। हिंदू धर्म और आध्यात्म की श्रेष्ठता स्थापित होने से। हिंदूओं में आत्म विश्वास, आत्म गौरव और देश
भक्ति जागृत हुई। जिसने राष्ट्र निर्माण में सहायता दी। विवेकानंद ने जो प्रार्थना
करना हिंदूओं को बताया था। उसका सारांश था। हे गौरी पति, हे विश्व की माता, मुझे
मनुष्यत्व प्रदान करों। ये शक्ति की मां। मेरी दुर्बलताओं को नष्ट करों। मेरी
नपुंसकता को नष्ट करो। मुझे एक मनुष्य बनाओ। इस प्रकार विवेकानंद को आधुनिक भारतीय
राष्ट्रीयता का पिता कहा जाता है। उन्होंने राष्ट्रीयता का निर्माण किया। उन्होंने
राष्ट्रीयता के महान् तत्वों को अपने जीवन में शामिल किया। मात्र 39 वर्ष 5 माह की
आयु में भारत के इस महान् स्वप्न दृष्टा और कर्मदूत ने चिर-समाधि प्राप्त की। इस
अल्पकाल में ही विवेकानंद ने आधुनिक भारत की आधारशीला प्रतिष्ठित की।
विवेकानंद ने अपने देहांत से कुछ दिन पहले ही एक
महत्वपूर्ण बात कही थी। यदि इस समय कोई दूसरा विवेकानंद होता। तो वह समझ सकता कि
विवेकानंद ने क्या किया।
स्वामी विवेकानंद के उपदेशों और पंडित दीनदयाल
उपाध्याय के एकात्म मानववाद और अंत्योदय दर्शन में अदभूत तालमेल दिखाई देता है। स्वामी
जी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सकारात्मक सेक्यूलरवाद अर्थात सर्व धर्म समभाव के
पक्षधर थे। विवेकानंद भी एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध थे। जो सुदृढ़,
समृद्ध स्वालंबी राष्ट्र हो। जिसका दृष्टिकोण आधुनिक, प्रगतिशील और प्रबुद्ध हो।
और जो अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति और मूल्यों से सगर्व प्रेरणा ग्रहण करता हो। इस
प्रकार एक महान विश्वशक्ति के रूप में उभरने में समर्थ हो। जो विश्व शांति और
न्याययुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित करने के लिए। विश्व के राष्ट्रों में
अपनी प्रभावशाली भूमिका का निर्वहण कर सकें। स्वामी जी के उपदेश आज भी हमारे लिए
एक ऐसे लोकतंत्रीय राज्य की स्थापना करने। जिसमें जाति, संप्रदाय और लिंग का भेद
किए बिना। सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक न्याय, समान अवसर और
धार्मिक विश्वास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शी
है। विवेकानंद जी के उपदेश समाजवाद और पंथ निरपेक्षता के सिद्धांतों के प्रति
सच्ची आस्था और निष्ठा और भारत की संप्रभुसत्ता, एकता और अखंडता को कायम रखने के
लिए प्रेरक होंगे।