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Monday, 10 February 2014

मध्यप्रदेश में जैव ऊर्जा का भविष्य

भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश
जैव ऊर्जा प्रकोष्ठ
प्रदेश कार्य समिति बैठक, 6 फरवरी 2014
कार्य समिति प्रस्ताव
प्रदेश कार्य समिति विश्वासस व्यक्त करती है, कि भारतीय जनता पार्टी देश का एकमात्र ऐसा राजनीतिक संगठन है जिसकी अपनी एक जन अभिमुख कार्यशैली है। यही वो बात है जो हमकों अन्यों से अलग पहचान देकर और स्थायी की विस्तार की ओर ले जाती है। भारतीय जनता पार्टी संगठन अपनी रीति-नीति के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ ज्वलंत समस्याओं से सरोकार रखने वाली योजनाओं को भी अंतिम व्यक्ति तक ले जाने में सरकार के साथ सहज प्रयास करता है। संगठन की इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों के लिए किये जा रहें सरकारी प्रयासों को जनता के हर तबके तक पहुंचाने के लिए गंभीर प्रयास कर अपने दायित्व को आकार देने में विश्वास व्यक्त करता है। इससे परंपरागत ऊर्जा संसाधनों जैसे – कोयला, पेट्रोल और लकड़ी के घटते भंडारों के भावी संकट से निपटा जा सकेंगा। मध्यप्रदेश सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों के विकास पर मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम के माध्यम से पूरे प्रदेश में गहन वैकल्पिक ऊर्जा विकास के कार्यक्रम चला रही है। जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ की प्रदेश कार्य समिति मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम के साथ समन्वय बिठाकर अपने उद्देश्य को आकार देने का संकल्प व्यक्त करती है।
वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों में जैव ऊर्जा (बायोमास ऊर्जा) के संसाधनों के मामले में मध्यप्रदेश अपने भीतर अपार संभावनाएं समेटे हुए है। मध्यप्रदेश पशु संसाधनों के हिसाब से देश के अग्रनी राज्यों में शामिल है। प्रदेश में पशुओं की संख्या 3 करोड़ 40 लाख से ऊपर है, जो प्रदेश की मानवीय जनसंख्या के लगभग आधी है। प्रदेश में मौजूद इस पशुधन से प्राप्त गोबर और पोल्ट्री फॉर्मों व सुअर बाड़ों से प्राप्त पशु विष्टा से ही अकेले 77 प्रतिशत प्रदेश के ग्रमीण अंचल की विद्युत आपूर्ती की जा सकती है। बस आवश्यकता है इसके पर्याप्त दोहन को दिशा देकर कार्यक्रम को एक आन्दोलन के तौर चलाने की। जैव ऊर्जा का उत्पादन एक बहुआयामी लाभ वाला है। इससे एक ओर सस्ती बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था होती है तो दूसरी ओर जैविक खाद मिलने के साथ-साथ पर्यावरण को भी हानि से बचाया जा सकता है। मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम गोबर गैस प्लांट लगाने के लिए अनुदान देकर अनेक प्रोत्साहन योजनाएं चला रहा है। भोपाल के भदभदा रोड स्थित शासकीय पशुपालन केन्द्र में एक मॉडल बायोगैस प्लांट विकसित किया गया है।
पशु विष्टा के अलावा मध्यप्रदेश वनस्पति बायोमास के लिहाज से भी एक समृद्ध राज्य है। मध्यप्रदेश एक सोयाबीन राज्य होने के नाते प्रदेश में सोयाबीन की भूसी बायोमास के तौर पर हमें एक बड़ा संसाधन उपलब्ध कराती है। निगम के सहयोग से मध्यप्रदेश में भूसी आधारित विद्युत प्लांट जदुखेड़ा जिला धार में लगाया गया है। निगम के प्रयासों से बैतूल जिले के ग्राम कसई को बायोमास से बिजली उत्पन्न करने वाला देश का पहला गांव बनेने का गौरव हांसिल हुआ है। मध्यप्रदेश में जट्रोफा से बायो फ्यूल बनाने का 10 किलोवाट का प्लांट बांसगढ़ी जिला मंडला में लगाया गया है। 
भारत में वनों की दृष्टि से मध्यप्रदेश पहले स्थान पर है। प्रदेश के लगभग 31.1 फीसदी क्षेत्रफल पर वन है। प्रदेश के वन क्षेत्र में अधिक जैव ऊर्जा देने वाली झाड़ियों को रोपित कर ( ऊर्जा की खेती) बायोमास के संसाधन को बढ़ाया जा सकता है। जल कुम्भी भी जैव ऊर्जा के उत्पादन के लिए बायोमास उपलब्ध कराने में एक अहम रोल अदा कर सकती है। बस आवश्यकता है इसका एकत्रीकरण कर उपयोग करने की। उत्तरी मध्यप्रदेश अर्थात् मध्यभारत के ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना और श्योपुर कला जिलों में गन्ने की खेती का केन्द्रीयकरण है। यहां गन्ने की खोई को बायोमास के तौर पर वृहत स्तर पर उपयोग कर जैव ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। ग्वालियर और मुरैना में गन्ने की बगास अर्थात् गन्ने की खोई से बिजली उत्पादन किया जा रहा है।
शहरी कचरा और नगरीय क्षेत्रों में मानवीय मल-मूत्र भी बायोमास की संभावनाएं खोलता है। प्रदेश में शहरी कचरे से बिजली बनाने का एकमात्र प्लांट भोपाल में है। इनके प्लांटों की संख्या और लगाकर जैव ऊर्जा के दोहन की पहल बड़े पैमाने पर की जा सकती है।
जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ के कार्यों का विस्तार करके वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा के प्रचार-प्रसार तक किया जाय तो अच्छा रहेगा। इनकी प्रदेश में अधिकतम संभावनाएं है। पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा के संसाधनों के विकास के लिए मध्यप्रदेश एक आन्दोलनात्मक पहल कर रही है। जिसके अच्छे परिणाम भी आ रहे है। उत्तर-पश्चिमी मध्यप्रदेश के जिले- मंदसौर, नीमच, रतलाम, देवास और इंदौर में जहां वायु गति की गति 12 किमी प्रति घंटे से अधिक है, पवन ऊर्जा की अच्छी संभावनाएं है। इन जिलों मध्यप्रदेश सरकार के प्रयासों से पवन ऊर्जा का लोग बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे है।
 मध्यप्रदेश सरकार के इन्हीं गंभीर प्रयासों के कारण आज मध्यप्रदेश पवन ऊर्जा का दोहन करने वाले राज्यों में देश में पहले स्थान पर है। प्रदेश में पवन ऊर्जा का उपयोग किसान बिजली बनाने और सिंचाई के लिए कर रहे है। इंदौर प्रदेश में सबसे अधिक पवन चक्कियां उपयोग करने वाला जिला बन गया है। देश की पहली संयुक्त क्षेत्र की कंपनी मध्यप्रदेश विण्ड फॉर्म मध्यप्रदेश में गठित की गई है। निगम के प्रयासों से गुना और मंदसौर जिलों में विण्ड मॉनिटरिंग कार्यक्रम विद्युत उत्पादन किया जा रहा है। निगम के सहयोग से मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा क्षेत्र देवास जिले के जामगोदरानी क्षेत्र स्थापित किया गया है।  
सौर ऊर्जा प्लांट स्थापित करने के लिए मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम वित्तीय और तकनीकी मदद देने के साथ-साथ अनुदान भी दे रहा है। जिसके अच्छे परिणाम सामने आये है। सोलर फोटो वोल्टिक प्लांटों से 300 वाट तक बिजली प्राप्त की जा सकती है। सौर तापीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम सोलर कुकर को प्रोत्साहन देने एक आंदोलन के तौर चला रहा है। सोलर ऊर्जा से डिस्टिल वाटर और सार्वजनिक स्थानों-संस्थाओं में स्नान करने प्लांट लगाने का भी काम तेज गति से कर रही है। अनेक सौर ऊर्जा ग्राम स्थापित किए जा रहे हैं। निगम की सहायता से विश्व का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट इटारसी में लगाया गया है। नरसिंहगढ़ में भी एक बड़ा सौर ऊर्जा प्लांट बिजली उत्पादन कर रहा है। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में अनेकों सौर ऊर्जा प्लांट काम कर रहे है। निगम के प्रयासों से आदिवासी जिले झाबुआ और अलीराजपुर में सबसे अधिक सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है। निगम के सहयोग से इंदौर जिले के कस्तूरबा ग्राम को पूरी तरह सौर ऊर्जा पर निर्भर गांव बनाया जा रहा है। निगम के ही सहयोग से ही भोपाल में सौर ऊर्जा आधारित कोल्ड स्टोर लगाया जा रहा है।
वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों के भोपाल में वैकल्पिक विद्युत ऊर्जा अनुसंधान केन्द्र स्थापित किया गया है। प्रशासनिक अकादमी भोपाल, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर और अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान संस्थान महू में वैकल्पिक ऊर्जा उद्यान अनुसंधान और विकास केन्द्र स्थापित किये गये हैं।ग्रामीण अंचल की महिलाओं को धुंए के चूल्हों से होने वाली स्वास्थ्य की हानि से बचाने के लिए मध्यप्रदेश ऊर्जा विकास निगम उन्नत चूल्हा कार्यक्रम चला रहा है।
जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ प्रदेश में मौजूद इन्ही अपार संभावनाओं के मद्देनजर प्रदेश के ग्रमीण अंचल में जैव ऊर्जा को बढ़ावा और प्रोत्साहन देने के लिए एक मित्र और मार्ग दर्शक के तौर पर सरकार और जनता के बीच एक समन्वयक की भूमिका निभाने का संकल्प व्यक्त करता है।
जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ प्रदेश सरकार के अटल ज्योति अभियान में अपनी भागीदारी का संकल्प व्यक्त करती है। जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ हमारे लोकप्रिय मुख्यमंत्री माननीय शिवराज सिंह चौहान के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का ही नतीजा है, आज प्रदेश के ग्रमीण अंचल को 24 घंटे बिजली मिल रही है और किसानों को दस घंटे सिंचाई के लिए भरपूर बिजली मिल रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बिजली किसी देश या प्रदेश की अर्थव्यवस्था की धमनियों में बहने वाले जीवन रक्त (लाइफ ब्लड) के समान है।
 शिवराज सिंह चौहान सरकार के गंभीर प्रयासों का ही नतीजा है। आज मध्यप्रदेश एक बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकल एक प्रगतिशील जुझारू राज्य बन गया है। मध्यप्रदेश आज औधौगिक रूप से विकसित राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु जैसे राज्यों के साथ कदम ताल करते हुए एक सुचारू राज्य बनने की ओर अपने तेज कदम बढ़ा रहा है। भाजपा सरकार के ही समन्वित गंभीर प्रयासों का नतीजा है। आज मध्य प्रदेश की आर्थिक वृद्धि दर (सकल घरेलू उत्पाद की) 10.2 प्रतिशत को छू रही है। जैव ऊर्जा विकास प्रकोष्ठ की प्रदेश कार्य समिति मप्र सरकार की इन्हीं लोकप्रिय नीतियों की उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच जाने का संकल्प व्यक्त करती है।



प्रस्तावक-                        अनुमोदक-
1. नाम, पद और हस्ताक्षर                                1. नाम, पद और हस्ताक्षर
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2. नाम, पद और हस्ताक्षर                          2. नाम, पद और हस्ताक्षर
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भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश
जैव ऊर्जा प्रकोष्ठ
प्रदेश कार्य समिति बैठक, 6 फरवरी 2014
:: कार्यक्रम व्यवस्था ::
पहला सत्र -

1.     संचालन-    दिनेश साहू, प्रदेश कार्यालय मंत्री, जैव ऊर्जा प्रकोष्ठ, मप्र
2.    दीप प्रज्जवलन- माननीय प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर जी, माननीय संगठन महामंत्री
            अरविन्द मेनन जी और मप्र ऊर्जी विकास निगम के अध्यक्ष विजेन्द्र सिंह सिसौदिया द्वारा
3.    स्वागत-     मुख्य अतिथियों का स्वागत
dinesh sahu
4.    प्रदेश संयोजक, जैव ऊर्जा प्रकोष्ठ, शैलेष केसरवानी जी का उदबोधन - प्रकोष्ठ की कार्य
            योजना, जिला संयोजकों को प्रकोष्ठ की जिला कार्य समितियों के गठन पर मार्ग दर्शन और
            बैठक में रखे जाने वाले कार्य समिति प्रस्ताव को प्रस्तुत करवाना
5.    कार्य समिति प्रस्ताव का प्रस्तुतिकरण - दो सदस्यों द्वारा प्रस्तुत, नाम और पद सहित
            हस्ताक्षर
6.        मप्र ऊर्जा विकास निगम के अध्यक्ष, माननीय विजेन्द्र सिंह सिसौदिया जी का उदबोधन- निगम             की सरकारी योजनाओं की जानकारी और उनसे कैसे जनता को लाभ पहुंचाया जा सकता है।


7. भोजन अवकाश

दूसरा सत्र –

8.        कार्य समिति प्रस्ताव पारित करवाना- दो सदस्यों के द्वारा समर्थन करवाकर, नाम और पद
            सहित हस्ताक्षर
9.        माननीय संगठन महामंत्री, अरविन्द मेनन जी का मार्गदर्शन
10.      समापन उदबोधन- भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष माननीय नरेन्द्र सिंह तोमर जी
            द्वारा इदम राष्ट्राय स्वा: , इदम राष्ट्राय, इदम न मम् !


  

  To ....................................
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    .....................................

         बंधुवर...! आपको जिला अध्यक्ष के अनुमोदन के उपरांत भाजपा प्रदेश अध्यक्ष माननीय नरेन्द्र सिंह तोमर जी और प्रदेश संगठन महामंत्री माननीय अरविन्द मेनन जी की सहमति से भाजपा जैव ऊर्जा प्रकोष्ठ मध्यप्रदेश का....................................
नियुक्त किया गया है।
आशा है आप पार्टी की रीति-नीति और विचारधारा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ प्रकोष्ठ के कार्यों को जन-जन तक ले जाने में अपने दायित्व का निर्वहन निष्ठापूर्वक प्रतिबद्धता के साथ करेंगे।
             सधन्यवाद......!
                                   भवदीय

                               शैलेष केशरवानी
                                                   प्रदेश संयोजक, जैव ऊर्जा प्रकोष्ठ 

Thursday, 26 December 2013

अरविंद केजरीवाल की अलख


अरविंद केजरीवाल की अलख
हाल ही के वर्षों में देश में भ्रष्टाचार डरा है...सहमा है.....ठिठका है......संयमित हुआ है......सोच में पड़ गया है। ये सब किसी सरकार या प्रशासनिक तंत्र की इच्छा शक्ति के जरिए नहीं हुआ। ये सब उन चंद साहसी लोगों के कारण संभव हो रहा है। जो समाज सेवा, प्रशासन, मीडिया में निडरता से साहस का परिचय दे रहे हैं। इनमें वे लोग भी शामिल है जो शासकीय प्रक्रिया को आधुनिक तकनीक से पारदर्शी बनाने में लगे हैं। 90 के दशक से शुरू हुई उदारीकरण की प्रक्रिया ने देश को तेज गति से भ्रष्टाचार की गिरफ्त में ले लिया। पूंजीवाद की ओर बढ़ते भारत में जिसे भी अवसर मिला उसने जमकर पूंजी बटोरी। लोग कंगाल से कुबेर बन गएं। गरीबों के हाथों में अब कटोरा आने की नौबत आन पड़ी हैं।
अन्ना हजारे के आंदोलन से देश की जनता की हथेली पर बढ़ती इस अभिशाप की रेखा को रोकने आशा की किरण भी दिखाई दी। अगस्त 2011 के अनशन के समय देश की लगभग समूची जनता अन्ना के साथ खड़ी हो गई। इससे देश आशा से गदगद हो गया। संसद ने भी जन इच्छा को भापकर, लोकपाल बनाने पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी। स्तब्ध करने वाली बात है कि इसे अमली जामा पहनाने में संसद अपना वचन पूरा न कर सकीं। देश की जनता उस समय सकते में आ गयी जब अन्ना हजारे का आंदोलन आंतरिक मतभेदों के चलते बिखर गया। जो पहले से इस आंदोलन में नजर आ रहा था वही हुआ। आंदोलन के सभी अहम सदस्य अपने आपकों किसी से छोटा समझने को तैयार नहीं थे। उनके हावभाव और आपसी प्रतिस्पर्धा ये साफ बया कर रहे थे। इस आंदोलन की उम्र अधिक नहीं। कोई अपने आप को पुरस्कार प्राप्त आईपीएस, तो कोई अपने आपको को सीनियर विधि विशेषज्ञ समझ केजरीवाल को सहन नहीं कर रहे थे। अन्ना के बाद दूसरे नम्बर पर कौन ? की इस आपसी धक्का-मुक्की में कोई स्टेज पर नहीं बचा। मंच ही गिर गया। 
खैर जो भी हुआ वो एकाएक न होकर साफ नजर आने वाली एक स्वचालित प्रक्रिया थी। जिसने भारत की जनता की हथेली पर भ्रष्टाचार की गहरी रेखा खींच दी। जिसे शायद आने वाले अगले कई सालों तक मिटाया न जा सकें। अब शायद कब कोई दूसरा अन्ना समय चुन पायेगा या नहीं। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। बड़ी मुश्किल से देश में समय ने कोई सर्वमान्य अन्ना चुना था। जिसमें लोगों अपना सुखद भविष्य नजर आने लगा था।
अब अरविंद केजरीवाल अलख जगाए, आशा की जोत देश को दिखा रहे है। अब लोगों को व्यक्तिगत तौर पर बदनाम करने के आरोप केजरीवाल पर लग रहे है। उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे लोगों को बदनाम कर केवल चर्चाओं में रहना चाहते है। मगर केजरीवाल पर आरोप लगाने वाले कोई विकल्प नहीं सुझा रहे हैं। भ्रष्टाचार के विरोध में अलख लेकर आगे कौन चलेगा ? बड़े-बड़े लोगों के विरोध में मुंह खोलने का साहस कौन करेगा ? भले ही मामला अंजाम तक न पहुंचे। लेकिन इसे शुरूआत तो माना ही जा सकता है। और ये कोई सामान्य परिवर्तन न होकर हमारे देश में प्रजातंत्र के परिपक्व होने का परिचय भी तो दे रहा है। जहां कोई सामान्य व्यक्ति भी बड़े से बड़े के काले कारनामों को उजागर करने का साहस कर रहा है। मुझे तो लगाता है इसे एक स्वस्थ परंपरा के तौर पर हमें इसे स्वीकार कर लेना बेहतर होगा। इससे हमें एक ओर व्यावहारिक जन लोकपाल मिल जायेगा। तो दूसरी ओर लालफीताशाही, भाई-भतीजावाद, आर्थिक व्यय के भार से मुक्ति मिलेगी। वहीं शिकायतों का ढेर नहीं लगेगा।
इस व्यावहारिक जन लोकपाल के अस्तित्व मात्र से ही पूरी तरह से तो नहीं, काफी हद तक भ्रष्टाचार कम होगा। इसके होने का डर ही अपराध करने से पहले व्यक्ति को ठहर कर सोचने पर विवश करेगा। यहीं व्यावहारिक जन लोकपाल आगे चलकर वैधानिक लोकपाल का पूरक और एक अच्छा हमसफर सहयोगी साबित होगा। कोई तो अलख जगाने वाला चाहिए। जो राजघाट की अमर ज्योति को अपनी स्मृति में रखकर। कपूर की जोत हथेली पर जलाकर अडिग रहे। यहीं टिमटिमाती लौ आगे समय आने पर ज्वाला बनकर बुराई का अंत कर सकती है। इस सोच को लेकर तो हम अरविंद केजरीवाल को धन्यवाद दे ही सकते हैं। अलख निरंजन......कांटा गड़े ना कंकर....!
(ऊं राष्ट्राय स्वाहा, इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम्)
http://www.newsbullet.in/live-tv

Thursday, 15 August 2013

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी का भाषण: चुनौती या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या स्वस्थ लोकतांत्रिक स्पर्धा ?

15 अगस्त को गुजरात के कच्छ के लालन कॉलेज से मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की दी गई स्पीच चर्चा और आलोचना का विषय बन गया है। आलोचकों का कहना है। एक तो राष्ट्रीय पर्व के दिन को इस राजनीतिक विरोध के लिए चुनना नैतिक दायरे से बाहर की बात है। दूसरे इस पवित्र दिन पर किसी मुख्यमंत्री के द्वारा भाषण के लिए  प्रधानमंत्री को खुली चुनौती देना देश की संघीय परंपरा के भविष्य के लिए लाभकारी नहीं होगा। वहीं मोदी के समर्थ इसे देश की जरूरत बताकर जायज ठहरा रहे हैं। ये लोग तर्क दे रहे हैं। आज देश का सक्षम नेतृत्व की जरूरत है। मोदी तो इसे विकास की एक स्वस्थ लोकतांत्रिक स्पर्धा बताकर अपनी बात को उचित ठहरा रहे है।
सोचने का तरीका चाहे जो भी हो। लेकिन देश की अधिकांश जनता इस बात को महसूस करने लगी है कि समस्याओं के संक्रमण से गुजरते भारत को एक अनुभवी, सक्षम और सूझबूझ वाले नेतृत्व की जरूरत है। ऐसे में परिक्वता की ओर बढ़ता भारत का मतदाता मोदी के बढ़ते कदमों को मजबूती दे सकता है। तो इसमें कोई नई बात नहीं होगी। इसके प्रमाण हमें देश में हुए कुछ राज्यों में हुए पिछले चुनावों में मिल चुके हैं। उम्र में बढ़ता ये देश का वही मतदाता है। जिसने उत्तरप्रदेश में विखंडित शासन का खात्मा कर दलित की बेटी को भारी बहुमत दिया। वो एक अलग बात है कि इसके बावजूद वो सुशासन नहीं दे पायी।
 दूसरी पारी में यूपी के इसी मतदाता ने विकल्प बदलकर मुलायाम की समाजवादी पार्टी को दो तिहाई से अधिक बहुमत देकर अपनी बढ़ती मानसिक आयु का परिचय दिया। उसने फिर इस राज्य को विखंडित बहुमत की खाई में नहीं गिरने दिया। भले ही अब इस सूबे में शासन की अच्छाईयों की अपेक्षा बुराईयां ज्यादा सामने आ रही है। 
इसी सूबे के मतदाता अब अगर अगले चुनावों में किसी राष्ट्रीय दल का दामन थाम ले तो यह कोई अचानक होने वाली घटना न होकर मतदाता की विकसित होती सोच का ही परिचायक होगी। ये वही मतदाता है जिसने बिहार में लंबे समय से चले आ रहे लालू प्रसाद यादव के एक छत्र डर को एक झटके में खत्म कर शासन की बागडौर स्वच्छ छबि वाले उदार नेता नीतिश कुमार के हाथ में सौंप दी। अब यही बात भारत का मतदाता राष्ट्रीय स्तर पर अगले साल होने वाले आम चुनवों में दोहरा सकता है। मोदी को भारी बहुमत देकर केन्द्र में ताजपोशी कर सकता हैं। जो भारतीय मतदाता की पूर्ण परिक्वता का ही परिचायक होगा। वो नरेन्द्र मोदी की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है। उसे विकल्प के तौर पर मोदी ही सामने नजर आ रहे है।
मोदी लोगों की पहली पसंद हो भी क्यों नहीं ?  मोदी 39 से अधिक अनुषांगिक संगठन वाले लोकतांत्रिक संघ परिवार में प्रशिक्षित हुए है। किसी व्यक्ति, परिवार या मुठ्ठी भर लोगों द्वारा रेग्यूलेट होने वाले संठन का साया उन पर नहीं है। उनके पीछे एक विशाल लोकतांत्रिक संघ परिवार खड़ा है। जहां निर्णय प्रक्रिया किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित न होकर विशुद्ध लोकतांत्रिक स्वरूप लिए हुए है। कुछ माह पहले तक अखड़ कहे जाने वाले मोदी अब सबकों साथ लेकर चलने की बात कर है। उनके ऊपर लगने वाले कट्टरता के तथाकथित आरोपों पर उनके द्वारा दी जा रही विकास की ललकार आच्छादित होती जा रही है। इंडिया फस्ट अब उनकी थीम बन गई है। जो उनकी भावी दृड़ राजनीतिक इच्छा शक्ति का संकेत दे रही है। देश में सर्वमान्य बनने की ओर उनके कदम लगातार बढ़ रहे है।
 केन्द्र को विकास की खुली प्रतिस्पर्धा की चुनौती देकर मोदी ने लोगों का दिल जीतने का ही काम किया है। स्वतंत्रता दिवस के पर्व पर प्रधानमंत्री को भाषण की चुनौती देकर मोदी ने मनमोहन सिंह को अपनी इच्छा शक्ति को अभिव्यक्त करने का अवसर दिया। इसे भी मनमोहन सिंह भुना नहीं पाये। अब इसमें मोदी की क्या गल्ती। देश की नजरे आत्मविश्वास से लबरेज मुखिया को तलाश रही है। जिसे मोदी ने अपने साहस पूरा ही तो किया है। मोदी ने उन पर लगने वाले तथाकथित सांप्रदायिकता के दाग इंडिया फस्ट को राष्ट्र धर्म बताकर ओझल कर दिया है। मोदी ने संविधान को देश का पवित्र ग्रंथ बताकर अपनी इच्छा शक्ति जता दी। राष्ट्र भक्ति को जनता जनार्दन की कोटी-कोटी सेवा बताकर उनके दिलों में घर बना लिया।
रही बात एनडीए में साथी दलों को जोड़ने या उनकी संख्या बढ़ाने की तो मोदी वो सभी नेता को सभी गट्स है। जो एक चमत्कारिक लीडरशीप में होने चाहिए। जो आने वाले समय में मूर्तरूप लेंगे। जयललिता के विकास मॉडल की प्रशंसा कर उन्होंने एडीएमके को अपना भावी साथी होने के संकेत दे दिये है। दूसरी ओर हैदराबाद में आम सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने तेलंगाना के लोगों के पक्ष में जोरदार आवाज उठाकर उनका दिल जीत लिया। वहीं चन्द्रबाबू नायडू को एन.टी. रामाराव के सपनों को पूरा करवाने की जिम्मेवारी दे दी। तेलंगाना वासियों के लिए सबसे पहले आवाज उठाने के श्रेय उन्होंने एन.टी. रामाराव को देकर अपने खुले दिल का परिचय दिया। टी.डी.पी. भी अब उनकी भावी सहयोगी होने की संभावना को मोदी ने बढ़ा दिया है।
ये वहीं मोदी जो अब अपने साथियों का नाम लेने से भी परहेज नहीं करते। उन्होंने लालन कॉलेज से अपने संबोधन में बीजेपी शासित राज्यों का ही तरजीह नहीं दी। बल्कि अन्य राज्य सरकारों के काम को भी दिल से बया किया। विकास को केन्द्र राज्य का समन्वित प्रयास बताकर उन पर लगने वाले एकला चलो रे के आरोप को भी विराम दे दिया। अब वे अपनी पार्टी के भी किसी नेता का नाम लेने से नहीं हिचकाकिचाते। भारत के आईटी शहर हैदराबाद में उन्होंने ओबामा के समान हम कर सकते हैं, जनता से लगवाकर अपनी दृड़ इच्छा का परिचय दिया है।
अब इन बातों को ध्यान में रखकर देश का मतदाता अगर बहुदलीय व्यवस्था का खात्मा कर किसी एक दल को बहुमत देता है तो वह देश हित में होगा। यह मतदाताओं की परिपक्वता को ही सूचित करेगा। इसमें अप्रत्याशित होने जैसी कोई बात नहीं होगी। देश की समस्याओं का हल अब मतदाताओं को ही अपने स्तर खोजना होगा। बोलों भारत माता की जय.......!
(इदम् राष्ट्राय स्वा: , इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम्)  


Saturday, 10 August 2013

हम अब अपनों के परतंत्र

            स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

1.   हमें तोड़नी होगी जंजीरें
2.   आने वाला समय आम लोगों की हाथ में
3.   नेताओं की खींची लक्ष्मण रेखाओं को लांघना होगा
       
 देश 67वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। भारत के इतिहास की अटल साक्षी। जो कभी नहीं डिगी। लाल किले की प्राचीर गर्व से फूली नहीं समा रही है। शायद यही सोचकर कि हर साल की तरह वो एक दिन फिर आ गया जब उसके आंगन में उल्लास और उमंग की चहल-पहल होगी। राष्ट्र ध्वज उसके माथे पर लहराएंगा। उसके अपने देश का नेतृत्व आम  लोगों की बेहतरी के लिए कदमों को आकार देंगा।
दूसरी ओर। लाल किला इस बात को भी सोंचकर सकते में है। यह कही थोड़ी देर के लिए तो नहीं। जो 66 साल से वो देखता-सुनता आ रहा है। उसे लगता है। पहले हम परायों के आधीन थे। अब तो हम अपनों के परतंत्र है। हमें अपनों ने ही अब जंजीरों में जकड़ लिया हैं। उनकी अपनी बनाई लक्ष्मण रेखाएं हैं। अब तो लगने लगा है। बेड़ियों को तोड़कर लक्ष्मण रेखाएं पार करनी होंगी।
देश में आज भी अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही लेकिन प्रतिक्रियावाद क्रियान्वित हो रहा है। हमारे रहनुमा राजनीतिक दल ही नहीं चाहते कि देश में तेज रफ्तार से एक तार्किक राजनीतिक व्यवस्था विकसित हो। 66 साल बाद भी आज रिमोटेड नेतृत्व हमारा दुर्भाग्य बना हुआ है। इन नेताओं ने सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को कम करने के लिए लोकपाल तक हमें नहीं मिलने दिया। कमी-बिसी जो भी होती लेकिन ओम्डुसमैन का अस्तित्व ही एक डर का वातावरण तो कायम करता। महंगाई ने तो हर पल आम लोगों का जीना दूभर कर दिया है। सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ये महंगाई किसी अनहोनी की आहट सुना रही है। भगवान न करें जो किसी दिन सड़कों पर आकर व्यवस्था को न निगल लें।
 दृड़ राजनीतिक इच्छा शक्ति वाले स्वतंत्र नेतृत्व के अभाव में देश पड़ोसियों की धृष्टताओं को सहन करने पर मजबूर है। चीन बार-बार दुस्साहस कर चुनौती दे रहा है। खीझ मिटाने के लिए बौना पाकिस्तान हमारे साथ नित नये-नये अमानवीय हरकतें कर रहा है। कभी हमारे सैनिकों के सिर कांट ले जाता है, तो कभी हमारी ही सीमा में आकर हमारे सैनिकों की हत्या कर देता है। आतंकवादी गतिविधियों को भारत में अंजाम देना तो पाक के लिए आम बात हो गई है। इन सबके बावजूद हमारा संयम नहीं टूट रहा है।
उदारीकरण की आड़ में देश में पसरता पूंजीवाद अमीर-गरीब के बीच की खाई को दिन दुनी-रात चौगुनी गहरा बना रहा है। इस अंधी चाल में असंगठित क्षेत्र के लिए व्यावहारिक धरातल पर कुछ नहीं हो रहा है। उठाये गये कदम कागजों में सिमट कर रह गये हैं। बस चिंता है तो पूंजीपति और पूंजी की। सर्वहारा वर्ग दबता ही चला जा रहा है। जो भविष्य में लावा बनकर फूट सकता है। गरीब दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं कर पा रहा है। दूसरी ओर अनाज करोड़ों टन अनाज खुले में आसमान के नींचे सड़ रहा हैं। गोदाम बनाने के काम को सरकार युद्ध स्तर पर नहीं चला पा रही है। नाश हो रहे अनाज को गरीबों में वितरित करने या बाजार की कीमतों को लगाम लगाने में उपयोग नहीं कर पायें।
बहन-बेटियों की सुरक्षा पर भी सरकारों अजीब-गरीब रवैया सामने आया। आज तक हम इनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पाये हैं। कड़े कानून नहीं बना पाये। कड़ी सजा नहीं दे पाएं। भले पूरा देश क्यों न उबल गया है। हां उनके ऊपर लाठियां बरसाकर उन्हें तितर-बितर करने का काम बखूबी किया। उठती हुई आवाजों को कानून की लंबी औपचारिक प्रक्रियों में लपेट दिया।
शिक्षा के लोक व्यापीकरण की जगह उसका व्यापारीकरण इस कदर हो रहा है कि देश में शिक्षित युवा बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही हैं। जो कभी भी सड़कों पर उतरकर अगुवाई कर सकता है। 
इन राजनीतिक दलों ने लोकपाल तो लोकपाल विधान सभाओं और संसद में महिलाओं को आरक्षण देने वाला बिल तक पास नहीं होने दिया। विधायिकाओं में महिलाओं को 33 फीसदी प्रतिनिधित्व देने वाले इस बिल को सालों से अपने-अपने राजनीतिक लाभ-हानि के जाल में उलझा रखा है। समाज की इस आधी आबादी को साथ बिठाने की प्रक्रियां तक पर वो सहमत नहीं पायें। हां ये सभी दल इस बात पर जरूर बिना लाग-लपेट के सहमत हो गएं कि सजा यापता व्यक्ति भी चुनाव लड़ सकता है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को कानून बनाकर बदलने में जरा देर नहीं लगाई। जिसमें कहा गया था कि कोई भी व्यक्ति जो दो साल की सजा भुगत चुका है वो कोई चुनाव नहीं लड़ सकता है।
 साथ विधान सभा या संसद से उसकी सदस्यता भी स्वत: ही समाप्त हो जायेगी। इस छोटे से कदम से राजनीति की आधी सफाई तो आसानी से हो जाती। लेकिन नेताओं को ऐ कैसे रास आता ? बहाना बना लिया कि इस फैसले को लागू करने से सार्वजनिक जीवन में विमुखता का संचार होगा। सार्वजनिक जीवन में अच्छे लोग आना कम हो जायेंगे। सार्वजनिक पदों के दायित्व के क्रियान्वयन में व्यवस्थागत कमी के चलते तो छोटी-मोटी गल्ती होना तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया में आता है। इसलिए तब तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। जब तक साबित नहीं हो जाता। उनका मानना है अभी जो लोग है वो सब अच्छे हैं। समाज में मौजूद अन्य लोग अनुभवहीन है। उनके ही हाथों में देश सुरक्षित हो सकता है। इसलिए कानून ही बदल दिया।
देश की जनता को भी इस स्वतंत्रता दिवस पर सोचना होगा कि नेताओं को दी इस स्वतंत्रता की पीछे कहीं हमारी मेहरबानी तो नहीं। जिसका वो अनुचित लाभ उठा रहे हैं। आम लोगों को मनन करना चाहिए कि इस बुराई को बड़ा करने में हमारी विमुखता ने तो खाद का काम नहीं किया। चिंतन कर जनता जनार्दन को जागना होगा कि वो क्या कर सकती हैं। उसके पास क्या लोकतांत्रिक और संवैधानिक साधन हैं। जिससे शांतिपूर्ण तरीके से वो इसका खात्मा कर सकती है। अब हम बालक नहीं रहें। बल्कि मानसिक आयु में बड़े हो गये हैं।

                          
आने वाले महीनों में होने वाले विधान सभा चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा के आम चुनावों में हम अपनी परिक्वता एहसास इन नेताओं करा सकते हैं। अच्छे लोगों को चुनकर। सक्षम नेतृत्व को सामने लाकर। बेहतर राजनीतिक दलों को बागडौर देकर। इन सबके लिए चलाना होगा हमें मतदान का ब्रह्म अस्त्र। बुराईयों के विरोध में सड़कों पर एकजुट उतरकर। कमजोरों की मदद के लिए हजारों हाथ बढ़ाकर। जन आंदोलनों में निजी महत्वाकांक्षा का त्याग कर।
तब और अब में अंतर केवल इतना है कि अंग्रेजों के जमाने में हमारे हाथ में कुछ भी नहीं था। केवल प्राणोत्सर्ग के दृड़ संकल्प के बिना। जो बड़ा लंबा और दुरूह रहा। आखिर में हम परायों से स्वतंत्र हो हुएं। लेकिन हम तुरंत ही अपनों की गोद में जा गिरें। जिन्होंने हमें लोरी सुनाकर सुला दिया। हमें मंद नींद की घुंटी पिलाकर पालने में झुलाते रहें। ताकि वो अपना काम आसानी से कर सकें। हम बालक की तरह मीठी नींद में मंद-मंद मुस्कुराकर सपनों में विचरण करते रहें। अब बड़े हुए तो सामने समस्याएं मुंह फैलाये खड़ी हैं। लेकिन अब हमें जागना होगा। सामने आना होगा। अपने अधिकारों का प्रयोग करना होगा। एकता दिखानी होगी।
 यहीं इस स्वतंत्रता दिवस पर हमारी ओर राष्ट्र को एक सच्चा उपहार होगा।

(इदम् राष्ट्राय स्वा:, इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम्)

लोकतंत्र की पहचान बनी जन आशिर्वद यात्रा


आज लोकतांत्रिक सरकारें अपने आप को अधिक से अधिक जन हितैषी कहलाने की प्रतिस्पर्धा में लगी हुई हैं। वो अधिक से अधिक लोक कल्याण के कार्य अपने हाथ में ले रही हैं। सभी राजनीतिक दल इसी आधार पर आपस में जोर-आजमाइश कर सत्ता की बागडौर अपने हाथ में लेने के भरसक प्रयास कर रहे हैं। जनता ने भी अपनी सारी जिम्मेवारी इन पार्टियों पर डाल रखी हैं। जनता भी अब छोटे से छोटे काम के लिए उनकी चुनी हुई सरकारों की ओर एक टक आशा लगाएं बैठी रहती हैं।
जनता जनार्दन के लोकमत के बिना कोई भी व्यक्ति या विचारधारा शासन में नहीं आ सकती। अपने इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ती के लिए राजनीतिक यात्राएं करने की परंपरा रही है। बस केवल अब इनका स्वरूप बदल गया है। पहले ये यात्राएं या तो व्यवस्था बदलने के लिए होती थी, या गुलामी की बेड़ियों से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए होती थी। लेकिन अब ये यात्राएं सत्ता पाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संविधान के दायरें में होती है। वहीं पहले ये यात्राएं जनता के साथ पैदल चलकर उनसे रूबरू होते हुए होती थी। लेकिन अब यात्राओं ने हाईटैक रूप ले लिया है। जनता और शासक के बीच की दूरी को बढ़ा दिया है। जिससे जन समस्याएं सीधे-सीधे नेता की नजर में आने से ओझल बनी रहती हैं। साथ ही शासक का प्रजा से भावनात्मक अपनत्व का दायरा सिकुड़ता जाता है।
मध्यप्रदेश की बीजेपी ईकाई ने प्रदेश में तीसरी बार अपनी विजय पताका फहराने के लिए जन आशिर्वाद यात्रा निकाली है। इस यात्रा की अगुवाई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कर रहे है। यात्रा को पूरे प्रदेश में भारी समर्थन मिल रहा है। सबसे पहले इसका श्रेय नेतृत्व के विनम्र व्यक्तित्व को जाता है। जो नेता और लोकतंत्र की पहली आवश्यकता होती है। दूसरी ओर लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री कन्यादान, तीर्थ दर्शन जैसी योजनाओं ने आम लोगों के दिलों को छू लिया है। अर्थव्यवस्था की धमनियों में बहने वाली बिजली पर्याप्त मात्रा में प्रदेशवासियों को मिल रही है। विकास धरातल पर आकार लेता लोगों को दिख रहा है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अन्त्योदय के विचार ने गरीबों के घरों तक पहुंच बना ली है। अब उन्हें स्वास्थ्य और सुबह-शाम के भोजन की चिंता करने वाला कोई नजर आने लगा है। अटल बिहारी बाजपेयी की प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना ने ग्रामीणों को रफ्तार दे दी है। सिंचाई रकबा दिनो-दिन बढ़ रहा है। नदियों को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी योजना प्रदेश में आकार ले रही है। सायरन बजाती हुई 108 एम्बुलैंस संकट के समय लोगों के कानों में सुनाई दे रही है। गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों में वितरित होती स्कालशिप ने माता-पिता के चेहरों पर खुशी बिखेर दी है। प्रदेश में उच्च, तकनीकी, स्वास्थ्य और प्रबंध की शिक्षा सभी के लिए सुलभ हो गई है।  प्रदेश में बीजेपी के लिए तीसरी बार सत्ता में आने के लिए रास्ता साफ होता दिखने के पीछे वे अन्य तमाम लोक कल्याणकारी योजनाएं है। जिन्होंने लोगों के दिलों में घर बना लिया है। साथ ही इस सफलता की तह में पार्टी संगठन की विशिष्ठ कार्यशैली भी है जो मूर्त रूप ले रही है।
 जो बीजेपी को लगातार सफलता की ओर ले जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में निकाली गई जन आशिर्वाद यात्रा आज लोकतंत्र की पहचान बन गई है। उनका सबकों साथ लेकर चलने वाला विनम्र व्यक्तित्व इसका दायरा और बढ़ा रहा है। उनका ऊर्जावान युवा नेतृत्व इसके लिए पसीना बहा रहा है। उन्होंने अपनी संयमित वाकपटुता से सबका दिल जीत लिया है। इस योग्यतम नेतृत्व के बलबूते पर प्रदेश में योजनाएं क्रियान्वित होकर आकार ले रही है। अब इन सबके चलते यदि बीजेपी तीसरी बार सत्ता मे आती है, तो आश्चर्य में डालने जैसी कोई बात नहीं होगी।

(इदम् राष्ट्राय स्वा:, इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम्)

Friday, 24 May 2013

लुर्सन सिटी एक्सप्रेस ?

सुझाव: भोपाल बी.आर.टी.एस. कॉरिडोर पर चलने वाली बस का नया नाम ?

हिन्दुस्तान का धड़कता दिल है, मध्यप्रदेश। और उसका मुकुट बनने का मौका मिला भोपाल को। सबसे बढ़कर झीलों की नगरी भोपाल को। भारत का लुर्सन कहलाने का गौरव हांसिल है। तेज गति से दौड़ते विकास के इस दौर में। हमारी राजधानी भी अछूती नहीं है। हॉल ही के वर्षों में। इस शहर ने भी। विकास और सुंदरता के नये आयाम छुएं हैं। और अब। नवनिर्मित बी.आर.टी.एस. पर हर तीन मिनट में। सिटी परिवहन की सुविधा देकर। 

 सरकार। इस शहर के माथे पर नयी ऊंचाईयां लिखने जा रही है। कॉरिडोर पर चलने वाली इन बसों के नाम रखने को लेकर। नागरिकों से सुझाव मंगायें गये हैं। मैं । भोपाल कॉरिडोर पर चलने वाली इन बसों का नाम लुर्सन सिटी एक्सप्रेस रखने का सुझाव देना चाहूंगा। इसके पक्ष में मेरे 11 तर्क पेश है   :-
1.  लुर्सन विश्व का सबसे सुंदर शहरों में से एक  है। ये सिटी यहां पाये जाने तालाबों के कारण सुंदर और सुरम्य आकार लिए हुए है। ऊंची-नींची पहाड़ियों पर बसी झीलों की नगरी भोपाल को भी भारत का लुर्सन कहलाने का गौरव हांसिल है। 
   2. लुर्सन नाम हमारे शहर के तालाबों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए हमें प्रेरणा देता रहेगा।
3.  ग्लोबल सिटी बनने की ओर कदम बढ़ाती हमारी भोपाल सिटी। लुर्सन नाम चर्चित होने के बाद। हमें भोपाल को लुर्सन के समान सुंदर, हराभरा, नियोजित, साफ सुथरा और अनुशासित शहर बनाने के संकल्प की हर पल याद दिलाता रहेगा।
     4.  मैने देश अनेक शहर देंखे। मगर मुझे कोई शहर नहीं भाया। बस अपना लुर्सन ही सबसे बेहतर लगा। शायद इसी कारण। आज भोपाल देश में सबसे पसंदीदा शहर बन गया है। इसी के चलते शहर में रियल स्टेट के दाम आसमान छू रहे है। हर कोई भोपाल में बसना चाहता है। 
           
5.  अन्य शहरों के तुलना में। राजधानी में लूटपाट, चोरी-चकाड़ी, जेब कतराई, यात्रियों को गुमराह करने वाली चिरकुटाई जैस दैनिक अपराध ना के बराबर है। जो हमारे शहर के व्यक्तित्व को सुंदर बनाते है।
6.  राजा भोज की सुंदर समृद्ध संस्कृति की अमिट छाप भी हमें पीढ़ी-दर पीढ़ी संस्कारों का मार्ग दिखाती रहेंगी। ज्ञान। जो सबसे सुंदर है। राजा भोज उसके सबसे उपासक थे। माँ सरस्वती, वागदेवी उनकी आराध्य थी। वहीं नवाबों की रियासत रहे। इस शहर पर मुगल कला के साथ-साथ। तहजीब का विशेष प्रभाव। आज भी शहर को एक अलग पहचान दे रहा है। बस यहीं भाई-चारे और आपसी मेलजोल की ये सुंदरता। हमें कोई सुंदर नाम रखने के लिए विवश करती है। और उचित भी है। क्योंकि सत्य ही सुंदर है। बाकी सब झूठा। और यहीं वो हमारी धरोहर है। जो निरंतर पर्यटकों को भोपाल आने के लिए लालायित करती रहेंगी।
 7.  लुर्सन नाम को पब्लिसिटी देकर। हम भोपाल के नागरिकों को। हमारे शहर को लुर्सन के समान सुंदर बनाने के लिए। संकल्प दिला सकते है। हर व्यक्ति को एक पौधा लगाकर। शहर को सुंदर बनाने की शपथ दिला सकते है। जनता के साथ सरकार को भी। प्लांटेशन के लिए। शहर में युद्ध स्तर पर एक अभियान चलाना चाहिये। इससे कॉरिडोर बनाते समय हुए। पेड़-पौधों के विनाश की पूर्ति भी होगी। क्योंकि शहर में कॉरिडोर तो बन गया। लेकिन हमारे शहर की। पहले वाली हरियाली गायब होने के बाद। शहर उजाड़-वावरा लग रहा है। हरियाली की पूर्ती और किसी के लिए नहीं। हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है।
8.  सरकार। झीलों के शहर लुर्सन को सामने रख। विस्तारित हो रहे शहर में। नये तालाबों के बनाने का प्रोजेक्ट चलाने के लिए। प्रेरणा ले सकती है। इससे शहर सुंदर और रमणीय बनेगा।
9.  भोपाल के विकास। या सुंदरता की बात हो। और नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर का नाम। याद ना किया जाय तो। बेमानी सा लगता है। गौर साहब के। इस सुंदर शहर को। सुंदर बनाने के सुंदर सपने। और सुंदर प्रयास।

 नगर को पेरिस बनाने का। उनका सपना। और अब सुनने में आ रहा है। भोपाल को मेट्रो ट्रेन देकर ही गौर साहब राजनीति से सन्यास लेंगे। हमारे नगरीय प्रशासन मंत्री के। इन सुंदर विचारों को। सुंदर आकार देने के लिए। शहर के सुंदर परिवहन का नाम भी। सुंदर ही होना चाहिये। ऐसे में। राजधानी के बी.आर.टी.एस. पर दौड़ने वाली। इन बसों का नाम। लुर्सन सिटी एक्सप्रेस ही बेहतर रहेगा। जो हमारे शहर को सुंदर और सुरम्य बनाने के लिए। हर पल प्रेरित करता रहेगा। 
       10.    कहते है। एक जूनियर के लिए। उसके सीनियर के घर से अच्छा। कोई ट्रेनिंग सेंटर नहीं होता। शायद यही वो बात है। जो हमारे शहर की महापैर। श्रीमती कृष्णा गौर को प्रेरित करती है। महापौर कृष्णा गौर भी। विगत चार सालों से। शहर को सुंदर आकार देने में। कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। गौर साहब की भावी उत्तराधिकारी। कृष्णा गौर को भी। बी.आर.टी.एस. बसों का ये नाम। शहर को। लुर्सन सिटी की तरह सुंदर बनाने के लिए। आगे भी प्रेरित करता रहेगा।
      11.       सबसे बढ़कर। हमें इन बसों में चलने वाले यात्रियों के साथ। स्टाफ के द्वारा किये जाने वाला व्यवहार। भी सुंदर बनाकर। यहां आने वाले। रहने वाले। लोगों को एक सुंदर संदेश देना होगा। ताकि। शहर की तहजीब की चर्चा। दूसरे शहरों में हो।
 देखने में आया है। पहले जब पर्पल बसे नहीं थी। तब प्रायवेट बस वाले। यात्रियों से बहुत ज्यादा। बदतमीजी करते थे। लेकिन जैसे ही। ये लाल बसे आयी। प्रतिस्पर्धा बढ़ी। उनकी सवारी कम हुई। तो प्राइवेट बस वालों का व्यवहार। जनता से मधुर हो गया। अब इसका दूसरा दुखद पहलू सामने आया है। अब लाल बस वाले जनता से दुर्व्यवहार कर रहे है। यहां तक की। हाथ उठाने में भी देर नहीं लगाते। सुंदर संस्कारों के। इस शहर में। सभी के सम्मान की रक्षा भी सुंदर होना चाहिये।
( इदम् राष्ट्राय स्वा:, इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम्)